फिल्म: मां
कलाकार: काजोल, खेरिन शर्मा, रोनित रॉय, इंद्रनील सेनगुप्ता आदि।
निर्देशक: विशाल फुरिया
लेखक: सैविन क्वाड्रस
निर्माता: अजय देवगन
अवधि: 2 घंटा 15 मिनट
वर्डिक्ट: **1/2
मनोज वशिष्ठ, मुंबई। Maa Movie Review: काजोल की फिल्म मां एक पौराणिक हॉरर थ्रिलर है, जो सिनेमाघरों में रिलीज हुई है। विशाल फुरिया निर्देशित और अजय देवगन व ज्योति देशपांडे निर्मित यह फिल्म मां काली और रक्तबीज की पौराणिक कथा को आधुनिक हॉरर के साथ जोड़ती है। मां अजय देवगन फिल्म्स के माइथोलॉजिकल हॉरर यूनिवर्स की अगली कड़ी है, जिसकी शुरुआत शैतान के साथ हुई थी, लेकिन क्या यह डराने में सफल रही?
क्या है मां की कहानी?
फिल्म की कहानी चंद्रपुर नामक एक गांव में एक मासूम बच्ची की बलि से शुरू होती है। चालीस साल बाद, अंबिका (काजोल) अपने पति शुभंकर (इंद्रनील सेनगुप्ता) और बेटी श्वेता (खेरिन शर्मा) के साथ शहर में खुशहाल जिंदगी जी रही है।
शुभंकर के पिता की मृत्यु के बाद, परिवार को चंद्रपुर में अपनी पैतृक हवेली बेचने के लिए जाना पड़ता है। वहां, उन्हें एक प्राचीन शैतानी शक्ति का सामना करना पड़ता है, जो रक्तबीज की एक बूंद से जन्मा है और अब श्वेता को निशाना बनाता है।
अंबिका अपनी बेटी को बचाने के लिए मां काली के अवतार में बदलती है और इस शैतानी ताकत से लड़ती है। कहानी मातृ प्रेम, पौराणिक कथाओं और हॉरर का मिश्रण है, जिसमें नारी शक्ति और कन्या भ्रूण हत्या के मुद्दों पर टिप्पणी की गई है।
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कैसा है स्क्रीनप्ले?
मां की पटकथा सैविन क्वाड्रस ने लिखी है। सैविन ने जिस विचार को लेकर कथा और पटकथा का खाका तैयार किया वो कागजों पर रोमांचक लगता है, मगर विशाल इस विचार को पर्दे पर उतना प्रभावशाली ढंग से उतार नहीं सके। फिल्म बिखरी हुई है।
इसका पहला हिस्सा धीमा और खिंचा हुआ लगता है, जिससे कहानी को गति मिलने में समय लगता है। इंटरवल के बाद कुछ रफ्तार आती है, खासकर जब मां काली और रक्तबीज की पौराणिक कथा सामने आती है।
हालांकि, कई दृश्य टीवी सीरियल जैसे नाटकीय और अतिरंजित लगते हैं, जो हॉरर के प्रभाव को कम करते हैं। कुछ दृश्यों का संयोजन स्ट्रेंजर थिंग्स से प्रेरित लगता है।
सामाजिक टिप्पणियां, जैसे नारी शक्ति और बालिका भ्रूण हत्या, कहानी में शामिल तो हैं, लेकिन इन्हें गहराई से नहीं उकेरा गया। यह महज कहानी को एक आधार देने के लिए रखा दया है, मगर इसे कसावट की जरूरत थी।
कैसा है कलाकारों का अभिनय?
अपने करियर की इस पारी में महिला प्रधान फिल्मों को तवज्जो दे रहीं काजोल इस फिल्म की रीढ़ हैं। पूरी फिल्म का प्रचार भी उन्होंने अकेले ही सम्भाला है। अजय देवगन निर्माता हैं, मगर एक-दो इवेंट्स को छोड़कर वो नजर नहीं आये, ताकि दर्शक किसी गफलत में ना रहे और फिल्म का फोकस काजोल पर ही रहे।
अंबिका के किरदार में मातृ प्रेम और नारी शक्ति को उकेरने में वो कामयाब रही हैं। क्लाइमैक्स में उनका मां काली वाला अवतार दमदार है, जो दर्शकों को बांधे रखता है। हालांकि, उनकी यह परफॉर्मेंस असाधारण नहीं कही जाएगी। काजोल जैसी सशक्त अभिनेत्री से इससे कम की उम्मीद भी नहीं रहती।
बेटी के रोल में खेरिन शर्मा (श्वेता) का अभिनय औसत है और कई जगह अपरिपक्व लगती हैं। रोनित रॉय (जॉयदेव) और इंद्रनील सेनगुप्ता ने अपने किरदारों को अच्छे से निभाया, लेकिन उनकी भूमिकाएं सीमित हैं। दिब्येंदु भट्टाचार्य जैसे प्रतिभाशाली अभिनेता का किरदार छोटा और प्रभावहीन है, जो निराश करता है।
कैसा है फिल्म का तकनीकी पक्ष?
फिल्म का VFX साधारण है। मां काली के दृश्य और कुछ पौराणिक तत्वों को अच्छे से प्रस्तुत किया गया है, खासकर क्लाइमैक्स में, लेकिन शैतान अम्सजा का डिजाइन गेम ऑफ थ्रोन्स के नाइट किंग और गार्डियंस ऑफ द गैलेक्सी के ग्रूट का मिश्रण लगता है, जो डराने के बजाय मजाकिया लगता है।
कई CGI दृश्य हल्के और टीवी सीरियल जैसे प्रतीत होते हैं, जो फिल्म की भव्यता को कम करते हैं। हालांकि, काली पूजा के दृश्य विजुअली असरदार हैं।
हॉरर फिल्मों में बैकग्राउंड स्कोर भय के भाव को बढ़ाने में अहम भूमिका निभाता। साउंड का सही प्रयोग दृश्यों में जान डालता है। अमर मोहिले का बैकग्राउंड स्कोर औसत है। यह हॉरर माहौल बनाने में पूरी तरह सफल नहीं हो पाता।
कई जगह यह जरूरत से ज्यादा नाटकीय हो जाता है, जो कहानी की गंभीर टोन को कमजोर करता है। डरावने दृश्यों में स्कोर का प्रभाव सीमित है और यह जंप स्केयर्स (अचानक होने वाली गतिविधि) पर ज्यादा निर्भर करता है। कुछ पौराणिक दृश्यों में स्कोर ठीक काम करता है, लेकिन कुल मिलाकर यह यादगार नहीं है।
फिल्म का संगीत श्रेया घोषाल और उषा उत्थुप जैसे दिग्गजों की आवाजें होते हुए भी निराशाजनक है। गाने कहानी में कोई खास प्रभाव नहीं छोड़ते और याद नहीं रहते। पौराणिक हॉरर थीम को देखते हुए संगीत को और प्रभावशाली बनाया जा सकता था।
कैसा है विशाल फुरिया का निर्देशन?
विशाल फुरिया का निर्देशन उनकी पिछली फिल्मों (लपछपी, छोरी) की तरह ही है। फिल्म का माहौल डरावना बनाने की कोशिश की गई है, लेकिन अतिरंजित दृश्य इस प्रयास को कमजोर कर देते हैं। क्लाइमैक्स में उनका निर्देशन दिखता है, लेकिन पहले हिस्से की धीमी गति और दोहराव ने कहानी को नुकसान पहुंचाया
मां महत्वाकांक्षी पौराणिक हॉरर फिल्म है, जो काजोल की अभिनय क्षमता पर टिकी है, लेकिन कमजोर पटकथा, औसत VFX और दोहराव वाली थीम इसे एक औसत अनुभव बनाते हैं। यह फिल्म काजोल के प्रशंसकों और हल्के-फुल्के हॉरर को पसंद करने वालों के लिए एक बार देखी जा सकती है।

