मुंबई। Dharmendra’s Movies and Legacy: सिनेमा की दुनिया में कलाकार तो बहुत आते हैं, मगर कम ही ऐसे होते हैं, जिन्हें पर्दे पर देखते-देखते अपनापन लगने लगे। धर्मेंद्र हिंदी सिनेमा के ऐसे ही एक सितारे थे, जिन्होंने अपने अभिनय और पर्दे के इस पार असल जिंदगी के किस्सों से कई पीढ़ियों को अपना बना लिया था।
पंजाब के एक छोटे से गांव से हीरो बनने निकले धर्मेंद्र पर्दे पर रोमांस और ताकत की मिसाल बने तो देश के छोटे कस्बों और गावों में किंवदंती बन गये थे। पर्दे पर उनकी ही-मैन वाली इमेज ने करोड़ों युवाओं को दीवाना बना दिया था।
फिल्मों से निकलकर सिनेमाई संस्कृति की पहचान बने धर्मेंद्र ऐसा नाम है, जिसने अपने हुनर से जॉनरों को परिभाषित किया। 24 नवम्बर को उनके निधन से सिनेमा में एक युग का वाकई में अंत हो गया… भारतीय सिनेमा का सबसे खूबसूरत चैप्टर हमेशा के लिए बंद हो गया!
पंजाब के छोटे से गांव में हुआ जन्म
8 दिसंबर 1935 को पंजाब के एक छोटे से गांव नसराली में स्कूल मास्टर केवल कृष्ण देओल के घर जन्मे धर्मेंद्र देओल ने 1960 में ‘दिल भी तेरा हम भी तेरे’ से अपनी सिनेमाई यात्रा शुरू की थी। लगभग 65 साल के इस सफर में उन्होंने 300 से ज्यादा फिल्मों में काम किया। वो विरले अभिनेता थे, जिसने रोमांस, एक्शन, कॉमेडी और सामाजिक ड्रामा, हर जॉनर में अपनी छाप छोड़ी।
उनकी विरासत ना केवल उनकी फिल्मों में है, बल्कि उस भावनात्मक गहराई और करिश्मे में छिपी है, जो उन्होंने भारतीय सिनेमा को दिया।
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पंजाब से मुंबई का सफर
सिनेमा की दुनिया में आने से पहले उन्होंने साधारण जीवन जीया, लेकिन फिल्मों का जुनून उन्हें मुंबई ले आया। 1958 में फिल्मफेयर की टैलेंट हंट प्रतियोगिता जीतने के बाद 1960 में अर्जुन हिंगोरानी निर्देशित ‘दिल भी तेरा हम भी तेरे’ से बतौर अभिनेता करियर शुरू किया था।
शुरुआती वर्षों में उन्होंने ‘बंदिनी’, ‘अनपढ़’ और ‘आये दिन बहार के’ जैसी फिल्मों में रोमांटिक भूमिकाएं निभाईं, जहां उनकी उसूलपसंद और भावनात्मक भूमिकाओं ने उन्हें एक ऐसे रोमांटिक हीरो की छवि दी, जो आदर्श है।
धर्मेंद्र के करियर को मोड़ देने वाली फिल्म 1966 में आई ‘फूल और पत्थर’ है, जिसमें उन्होंने एक मवाली की भूमिका निभाई थी। जिंदगी के थपेड़ों ने जिसे ऊपर से सख्त बना दिया है, मगर दिल से बेहद कोमल है। इस फिल्म ने उन्हें बॉलीवुड का पहला रियल एक्शन हीरो बना दिया। धर्मेंद्र ने पहली बार शर्टलेस पोज दिया, जो आइकॉन बन गया।
धर्मेंद्र का गोल्डन एरा
1960 से 1970 का दशक धर्मेंद्र के करियर का गोल्डन टाइम कहा जा सकता है, जिसमें उन्होंने कई आइकॉनिक फिल्में दीं। यह वो दौर था, जब धर्मेंद्र एक्शन से लेकर रोमांस और कॉमेडी कर रहे थे।
‘हकीकत’ (1964) में उन्होंने 1962 के भारत-चीन युद्ध में साहस और बलिदान की कहानी बयां की, जबकि ‘अनुपमा’ (1966) में एक कोमल कवि की भूमिका में भावनात्मक गहराई दिखाई।
हिंदी सिनेमा की पहली स्पाइ फिल्म कही जाने वाली ‘आंखें’ (1968) में वो एक जासूस बने। इस फिल्म का संगीत बेहद लोकप्रिय हुआ और आज भी है।
‘सत्यकाम’ (1969) में एक आदर्शवादी व्यक्ति की भूमिका ने उन्हें आलोचकों से वाहवाही दिलाई, जिसे भारतीय सिनेमा की सर्वश्रेष्ठ परफॉर्मेंसेज में से एक माना जाता है।
‘मेरा गांव मेरा देश’ (1971) में एक ऐसे क्रिमिनल की भूमिका में नजर आये, जो दूसरों के लिए जान जोखिम में डालता है। यही फिल्म आगे चलकर कालजयी शोले की आधारशिला बनी।
‘सीता और गीता’ (1972) में हेमा मालिनी के साथ उनकी केमिस्ट्री ने कॉमेडी-ड्रामा को यादगार बनाया। ‘यादों की बारात’ (1973), ‘प्रतिज्ञा’ (1975), ‘चुपके चुपके’ (1975) और ‘धरम वीर’ (1977) जैसी फिल्मों में उन्होंने एक्शन, कॉमेडी और फैंटेसी को छुआ।
‘शोले’ (1975) में वीरू की भूमिका ने उन्हें अमर कर दिया। अमिताभ बच्चन के साथ उनकी जोड़ी, पानी की टंकी पर ‘सुसाइड’ वाला सीन और ‘ये दोस्ती’ गाना आज भी सिनेमा के इतिहास का हिस्सा हैं।
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1980 और 1990 के दशक में उन्होंने एक्शन हीरो की इमेज को बनाए रखा, फिल्मों जैसे ‘गुलामी’ (1985), ‘लोहा’ (1987), ‘हुकूमत’ (1987) और ‘क्षत्रिय’ (1993) में उन्होंने अपने एक्शन से खूब तालियां बटोरीं।
दिग्गज निर्देशकों के साथ काम
धर्मेंद्र ने बिमल रॉय, यश चोपड़ा, ऋषिकेश मुखर्जी और रमेश सिप्पी जैसे निर्देशकों के साथ काम किया, जो उनकी किरदार और जॉनर में ढल जाने की कला को दर्शाता है। उनकी आखिरी फिल्म इक्कीस है, जो 25 दिसम्बर को रिलीज हो रही है। इसके निर्देशक श्रीराम राघवन हैं।
रील से कम नहीं थी रियल लाइफ की कहानी
धर्मेंद्र का निजी जीवन भी उनकी फिल्मों जितना चर्चित रहा। उनकी पहली शादी प्रकाश कौर से हुई, जिनसे उनके दो बेटे सनी देओल-बॉबी देओल और दो बेटियां अजीता और विजेता हुईं। सनी और बॉबी सफल अभिनेता हैं, मगर बेटियां फिल्मों से दूर रहीं।
हेमा मालिनी के साथ धर्मेंद्र की ऑन स्क्रीन केमिस्ट्री ऑफ स्क्रीन भी मशूहर रही। बाद में उन्होंने हेमा मालिनी से शादी की, जिनसे बेटियां एशा और अहाना हुईं। हेमा के साथ उन्होंने 30 से ज्यादा फिल्में की थीं, जिनमें से ज्यादातर हिट रहीं।
हेमा मालिनी के साथ उनकी ऑन-स्क्रीन जोड़ी ‘तुम हसीन मैं जवां’, ‘शराफत’, शोले और ‘जुगनू’ जैसी फिल्मों में चमकी।
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नई सदी में धर्मेंद्र की फिल्में
नब्बे के दशक के अंत से धर्मेंद्र चरित्र भूमिकाएं करने लगे। सलमान खान, अरबाज खान और काजोल के साथ उनकी प्यार किया तो डरना (1998) आई।
सदी बदली, मगर धर्मेंद्र का फिल्मी सफरनामा जारी रही। ‘लाइफ इन ए… मेट्रो’ (2007) और ‘जॉनी गद्दार’ (2007) जैसी फिल्मों में उन्होंने अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज करवाई।
2007 में आई अपने में धर्मेंद्र ने पहली बार सनी और बॉबी के साथ स्क्रीनस्पेस शेयर किया था। इसके बाद ‘यमला पगला दीवाना’ सीरीज में काम किया, जो पारिवारिक मनोरंजन की मिसाल बनीं।
2020 के बाद बढ़ती उम्र के कारण फिल्मों में उनकी सक्रियता कम हो गई। हालांकि, जोश कम नहीं हुआ। धर्मेंद्र सोशल मीडिया में सक्रिय रहने लगे। 2023 में आई करण जौहर की फिल्म रॉकी और रानी की प्रेम कहानी में शबाना आजमी के साथ उनका किस सीन खूब चर्चित रहा।
2024 में वो ‘तेरी बातों में ऐसा उलझा जिया’ के जरिए बड़े पर्दे पर नजर आये, जिसमें शाहिद कपूर और कृति सेनन ने मुख्य भूमिकाएं निभाई थीं। निधन के बाद धर्मेंद्र एक बार फिर बड़े पर्दे पर ‘इक्कीस’ के जरिए दिखेंगे, जो 25 दिसंबर को रिलीज होने वाली है, जो उनके करियर की आखिरी फिल्म होगी।

अफसोस की बात यह है कि हिंदी सिनेमा में आइकॉनिक फिल्में और किरदार करने के बाद भी धर्मेंद्र मुख्यधारा के पुरस्कार समारोहों में उपेक्षित रहे। उन्हें नामांकन तो मिले, मगर बेस्टर एक्टर कैटेगरी में अवॉर्ड जीत नहीं सके। 1997 में उन्हें फिल्मफेयर ने लाइफ टाइम अचीवमेंट के लिए पुरस्कार दिया। 2012 में भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण पुरस्कार से नवाजा।
धर्मेंद्र से जूनियर कलाकारों को सिनेमा का सर्वोच्च सम्मान दादा साहब फाल्के मिल चुका है, मगर इतना सुसज्जित करियर होने के बावजूद उन्हें अभी तक यह पुरस्कार नहीं दिया गया, जो अक्सर फैंस के बीच चर्चा का विषय बनता है।


