मुंबई। Dharmendra Death News: यह बात किसी से छिपी नहीं है कि धर्मेंद्र हिंदी सिनेमा के थेस्पियन दिलीप कुमार के बहुत बड़े फैन थे। कई मौकों पर धर्मेंद्र ने खुद यह बात स्वीकार की और दिलीप साहब के लिए अपनी दीवानगी जाहिर करने में कभी संकोच भी नहीं किया। तब भी नहीं, जब धर्मेंद्र खुद हिंदी सिनेमा के सुपरस्टार बन चुके थे।
लुधियाना के नसराली गांव में जन्मे और साहनेवाल में पले-बढ़े धर्मेंद्र पर हीरो बनने का जुनून बेहद कम उम्र में ही सवार हो गया था। इसकी बहुत बड़ी वजह थे दिलीप कुमार, जिनकी 1948 में आई फिल्म शहीद देखने के बाद धर्मेंद्र ने ठान लिया कि वो भी मुंबई जाएंगे और हीरो बनेंगे।
दिलीप कुमार के बंगले में घुस गये धर्मेंद्र
शहीद की रिलीज के समय धर्मेंद्र की उम्र 13-14 साल रही होगी। हीरो बनने की दीवानगी इस कदर सिर चढ़ी कि जब 17 साल के हुए तो किस्मत आजमाने मुंबई पहुंच गये, जहां उनका पहला मकसद था अपने आदर्श यूसुफ साहब यानी दिलीप कुमार का दीदार करना।
अपने हीरो से मिलने की यह ख्वाहिश एक दिन धर्मेंद्र को सीधे दिलीप साहब के पाली हिल स्थित बंगले पर ले गये। जुनून की इंतहा देखिए, धर्मेंद्र सीधे दिलीप कुमार के बंगले में दाखिल हो गये। भरी दोपहरी का समय था, किसी ने रोका भी नहीं। अंदर जाकर देखा तो दिलीप कुमार सोफे पर सो रहे थे।
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अपने हीरो इतने नजदीक से सामने देख धर्मेंद्र कुछ पल के लिए जड़वत हो गये। दिलीप साहब की आभा में डूबे धर्मेंद्र उन्हें एकटक देख रहे थे। उनकी नजरबंदी तब टूटी, जब अचानक दिलीप साहब की आंख खुली। दिल के हाथों मजबूर होकर 17 साल का नौजवान हिम्मत करके घर में तो घुस आया, मगर मसीहा से आंखें मिलीं तो सकपका गया।
धर्मेंद्र तीर की तरह फौरन बाहर की ओर भागे और बिना कुछ कहे निकल गये। हिंदी सिनेमा में ऐसी कहानियां हजारों हैं कि अपने चहेते हीरो से मिलने के लिए किसी फैन ने हद लांघ दी हो, मगर हद लांघने वाला हर फैन धर्मेंद्र नहीं बनता।
टैलेंट हंट के साथ हुई मुंबई वापसी
मुंबई में कोई मौका ना मिलने के कारण धर्मेंद्र पंजाब लौट गये और वहां एक ड्रिलिंग कम्पनी में काम करने लगे, मगर मन तो मुंबई में ही छोड़ गये थे। इसलिए, जब फिल्मफेयर मैगजीन का टैलेंट हंट का लिज्ञापन देखा तो लगा कि जिंदगी फिर मौका दे रही है।
धर्मेंद्र ने टैलेंट हंट में भाग लिया और दूसरे स्थान पर रहे। हालांकि, संघर्ष खत्म नहीं हुआ। इस दौर में उनकी प्रेरणा बने मनोज कुमार, जिन्होंने धर्मेंद्र को लौटने से रोक लिया। आखिरकार, अर्जुन हिंगोरानी ने धर्मेंद्र को दिल भी तेरा हम भी तेरे से ब्रेक दिया, जो 1960 में आई।
इससे पहले 1958 में जब धर्मेंद्र टैलेंट हंट प्रतियोगिता के लिए मुंबई आये तो दिलीप कुमार से मुलाकात का सपना पूरा हुआ। ब्रिज का काम किया दिलीप साहब की छोटी बहन फरीदा ने, जो उस समय फेमिना मैगजीन में काम करती थीं।
एक शाम धर्मेंद्र अपने आइडल दिलीप कुमार से मिले। दोनों में खूब बातें हुईं। शाम का वक्त था। थोड़ी सर्दी होने लगी थी। लौटते वक्त दिलीप साहब ने धर्मेंद्र को अपना स्वेटर दिया।

दिलीप कुमार ने दिया अपना स्वेटर
धर्मेंद्र के निधन के बाद सायरा बानो ने दिलीप साहब से उनकी मुलाकात का किस्सा इंस्टाग्राम पर शेयर किया है। सोमवार को सायरा धर्मेंद्र को अंतिम विदाई देने श्मशान भूमि भी पहुंची थीं। सायरा ने लिखा- धरम जी के निधन से ऐसा लगा कि हमारे साझा सिनेमाई और निजी इतिहास का एक अध्याय बंद हो गया, मगर अपने पीछे ऐसी गरमाहट छोड़ गया है, जो आज के समय में दुर्लभ है। मेरे लिए, उनका जाना सिर्फ एक सहकर्मी का जाना नहीं है, वो मेरे प्यारे यूसुफ साहब के धरम थे।

दिलीप कुमार के साथ धर्मेंद्र की फिल्में
एक-दूसरे के इतने करीब होते हुए भी धर्मेंद्र और दिलीप कुमार ने सिर्फ एक फिल्म में स्क्रीन स्पेस शेयर किया था। यह बंगाली फिल्म पारी थी, जिसमें दिलीप कुमार ने जेलर के रोल में स्पेशल एपीयरेंस किया था। बाद में इस फिल्म का हिंदी रीमेक अनोखा मिलने के नाम से 1972 में आया।
सायरा बानो के साथ धर्मेंद्र की फिल्में
हालांकि, धर्मेंद्र और सायरा बानो ने कई फिल्मों में साथ काम किया। दोनों की पहली फिल्म 1962 में आई शादी है, जिसमें धर्मेंद्र ने सायरा बानो के भाई का रोल निभाया था, जबकि मनोज कुमार उनके पति बने थे। इसके बाद आई मिलन की बेला, आदमी और इंसान, ज्वार भाटा, रेशम की डोरी, इंटरनेशनल क्रुक, पॉकेटमार,साजिश और चैताली में दोनों कलाकार साथ दिखे।

