Kartavya Review: सैफ अली खान ने निभाया अभिनय का ‘कर्त्तव्य’, रोमांच और ‘आनंद’ विहीन सौरभ द्विवेदी का डेब्यू!

Kartavya movie review. Photo- X
फिल्म: कर्त्तव्य 
निर्देशक: पुलकित
कलाकार: सैफ अली खान, रसिका दुग्गल, जाकिर खान, संजय मिश्रा, सौरभ द्विवेदी आदि।
निर्माता: गौरी खान
प्लेटफॉर्म: नेटफ्लिक्स
अवधि: 104 मिनट
वर्डिक्ट: ** (2 स्टार)

मनोज वशिष्ठ, मुंबई। Kartavya Movie Review: इंडिया टुडे ग्रुप की हिंदी वेबसाइट द लल्लनटॉप से इंडियन एक्सप्रेस हिंदी की कमान संभालने पहुंचे पत्रकार सौरभ द्विवेदी ने विश्राम के दिनों में डीटूर लिया और बॉलीवुड पहुंच गये। स्क्रीन अवॉर्ड्स की मेजबानी करने के बाद नेटफ्लिक्स पर आज (15 मई) को रिलीज हुई फिल्म कर्त्तव्य से अभिनय की पारी भी शुरू कर दी।

इस फिल्म में सौरभ का किरदार एक ऐसे आध्यात्मिक गुरु आनंदश्री का है, जो बच्चों के साथ दुष्कर्म करता है और उन्हीं के जरिए अपने अपराध की दुनिया चलाता है। उसकी जबरदस्त फॉलोइंग है और अपने इलाके (झामली- हरियाणा में स्थित कोई कस्बा) में दबदबा रखता है। चाहे जितना बड़ा अपराध कर दे, कानून के लम्बे हाथ उसकी गर्दन तक नहीं पहुंच पाते।

इस रिव्यू की शुरुआत सौरभ के किरदार से आरम्भ करने की सबसे बड़ी वजह खुद सौरभ ही हैं, जिनके अभिनय को देखकर जहन में ख्याल आता है कि अच्छा हुआ, महाराज पत्रकारिता में लौट गये। अगर, इसी तरह अभिनय करना है तो बेहतर है, दिल्ली-नोएडा में ही रहें, मुंबई की फ्लाइट ना पकड़ें।

क्या है फिल्म की कहानी?

दिल्ली की एक जानी-मानी महिला पत्रकार झामली में विवादित आध्यात्मिक गुरु आनंदश्री के बारे में उड़ने वाली अफवाहों की जांच करने आती है। हरियाणा पुलिस के इंस्पेक्टर पवन मलिक को सुरक्षा की जिम्मेदारी दी गई है, मगर दो बाइक सवार लड़के रात में सरेआम उसकी गोली मारकर हत्या कर देते हैं। एक हत्यारे को पवन मौके पर ही मार गिराता है, दूसरा भाग जाता है।

पवन का सीनियर अधिकारी केशव उसे सस्पेंड करने को कहता है, मगर पवन सात दिनों का वक्त मांगता है। इस बीच दूसरा ट्रैक शुरू हो जाता है। उसका छोटा भाई दूसरी जाति की एक लड़की के साथ भाग जाता है। खाप पंचायत दोनों परिवारों से मशविरा करने के बाद फैसला सुनाती है कि दोनों को पकड़कर लाओ और मार डालो। इस फैसले में पवन का पिता भी शामिल है, जिसकी जानकारी पवन को नहीं है।

अब पवन के सामने दो चुनौतियां हैं- भाई को सुरक्षित रखना और पत्रकार के कातिल को ढूंढना। इस बीच पवन का सीनियर केशव उसे बताता है कि पत्रकार की हत्या करने वाला दूसरा कातिल एक बच्चा है, जिसका नाम हरपाल है। वो पवन को उसे ढूंढने के लिए कहता है।

बच्चे से पवन को पता चलता है कि पत्रकार की हत्या आनंदश्री ने करवाई है। पवन बच्चे के जरिए आनंदश्री को कानून के शिकंजे में कसने में जुट जाता है।

यह भी पढ़ें: OTT Releases (11-17 May): धुरंधर 2, कर्तव्य, इंस्पेक्टर अविनाश… इस हफ्ते ओटीटी पर क्राइम एक्शन को बोलबाला, दखें लिस्ट

टॉक शो के अंदाज में अभिनय करते दिखे सौरभ

दिलचस्प बात यह है कि पत्रकारिता में डेढ़ दशक से ज्यादा बिता चुके सौरभ के अभिनय की पारी ऐसे किरदार से शुरू हुई है, जिस पर एक दिग्गज पत्रकार की हत्या करवाने का संगीन आरोप लगता है। वो बात अलग है कि इस कद्दावर किरदार में सौरभ की संवाद अदाएगी और भाव-भंगिमाएं देखकर यही लगा कि वो अभी भी अपना कोई राजनीतिक शो होस्ट कर रहे हैं।

अपार सम्भावनाओं वाले इस किरदार का सौरभ के अभिनय ने जो कत्ल किया है, उसकी सजा के तौर पर उन्हें ताउम्र बॉलीवुड से तड़ीपार कर देना चाहिए, क्योंकि इस फिल्म के बिखरने की सबसे बड़ी और अहम वजह इस किरदार की जान निकलना ही है।

पता नहीं क्या मजबूरी रही होगी कि सौरभ के कुल जमा चार दृश्यों को एडजस्ट करने के लिए लेखकों ने फिल्म की कहानी को ऐसा बिखेरा कि समेटना मुश्किल हो गया।

पहले भटकी और फिर बिखरी कहानी

समझ में नहीं आया कि इस फिल्म के जरिए लेखक-निर्देशक ऑनर किलिंग का भयावह चेहरा दिखाना चाहते थे या फर्जी आध्यात्मिक गुरुओं की साजिशों का जाल। अगर फिल्म में सौरभ द्विवेदी का किरदार नहीं भी होता तो कहानी में बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ता।

इतनी फिल्म देखने के बाद दर्शक को लगता है कि पवन के भाई और आनंदश्री के ट्रैक आगे जाकर कहीं मिलेंगे, जिसके साथ बड़ा सस्पेंस खुलेगा। आनंदश्री के खिलाफ इनवेस्टीगेशन से शुरू हुई फिल्म क्लाइमैक्स तक पहुंचते-पहुंचते ऑनर किलिंग की कहानी में बदल जाती है और आनंदश्री का ट्रैक पूरी तरह नजरअंदाज हो जाता है।

दर्शक कन्फ्यूज! आखिरकार, लेखक-निर्देशक क्या दिखाना चाहते थे। ना इनवेस्टिगेटिव थ्रिलर बन सकी, ना ही सोशल इशू पर आधारित दमदार फिल्म। क्या यह फिल्म सिर्फ सौरभ द्विवेदी को बॉलीवुड में लॉन्च करने के लिए बनाई गई है या सैफ अली खान की हरियाणवी उच्चारण में महारत दिखाने के लिए? कुछ समझ नहीं आता।

कमजोर रहा पुलकित का निर्देशन

लेखक-निर्देशक पुलकित ने फिल्म की कहानी के लिए जो जमीन तैयार की, वो दिलचस्प है और ट्रेलर देखकर लगा था कि एक बेहतरीन फिल्म देखने को मिलेगी, मगर पुलकित अपना कर्त्तव्य ठीक से निभा नहीं पाये। इससे बड़ा पाप क्या होगा कि संजय मिश्रा जैसे बेहतरीन कलाकार को बर्बाद कर दिया।

सैफ अपने किरदार में ठीक लगे हैं और उन्होंने हरियाणा पुलिस के इंस्पेक्टर पवन मलिक के किरदार में उतरने की पूरी कोशिश की है। मगर, पुलकित ने कहानी का ऐसा कचरा किया कि सैफ भी क्या करते। रसिका दुग्गल अच्छी अभिनेत्री हैं और यहां भी पवन की पत्नी के किरदार में उन्होंने ठीक काम किया है।

सौरभ द्विवेदी की खलनायकी से शुरू होकर फिल्म पवन के पिता बने जाकिर खान द्वारा बेटे की हत्या पर खत्म होती है। मतलब जो, मेन ट्रैक था, वो साइड हो गया और जो साइड ट्रैक था, वो मेन हो गया।

हैरानी इस बात की भी है कि इस फिल्म का निर्माण शाह रुख खान की कम्पनी रेड चिलीज के लिए उनकी बेगम गौरी खान ने किया है। अगर, फिल्म सौरभ द्विवेदी के किरदार आनंदश्री के ट्रैक पर ही चलती और उनकी जगह जयदीप अहलावत जैसे किसी दमदार कलाकार को लिया जाता तो कर्त्तव्य का मिजाज ही अलग होता।