Governor Movie Ticket Price: 1990 की कीमत में देखिए मनोज बाजपेयी की फिल्म गवर्नर! मेकर्स ने निकाला प्रमोशन का अनोखा तरीका

Governor ticket price down to 90s. Photo- X

मुंबई। Governor Movie Ticket Price: मनोज बाजपेयी अभिनीत फाइनेंशियल थ्रिलर फिल्म गवर्नर आने वाले शुक्रवार को सिनेमाघरों में रिलीज होगी। सोमवार को मेकर्स ने फिल्म प्रमोशन का अनोखे तरीके की घोषणा की, जिसके मुताबिक गवर्नर के कुछ टिकट्स 1990 के दाम में मिलेंगे।

90 के दामों पर मिलेंगे फिल्म के टिकट

निर्माता कम्पनी सनशाइन पिक्चर्स की ओर से सोशल मीडिया में साझा की गई जानकारी के अनुसार, फिल्म के 25000 टिकट 1990 के काम पर बेचे जाएंगे। इसकी वजह है फिल्म की कहानी, जो 1990 के दौर की है, जब देश एक बड़े आर्थिक संकट से गुजर रहा था।

चिन्मय मांडलेकर निर्देशित फिल्म में मनोज एक राष्ट्रीय बैंक के गवर्नर के रोल में हैं, जो देश को आर्थिक संकट से निकालने के लिए अपनी जान लड़ा देता है और ऐसा फैसला लेता है, जो इससे पहले कभी किसी ने सोचा भी नहीं था। इसके लिए उसे सियासत और सिस्टम से लड़ना पड़ता है।

मनोज का किरदार रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के तत्कालीन गवर्नर एस वेंकटरामनन से प्रेरित बताया जाता है।

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गवर्नर 12 जून को सिनेमाघरों में रिलीज हो रही है। फिल्म में अदा शर्मा भी अहम किरदार में नजर आएंगी।

क्या था 1991 का आर्थिक संकट?

1991 में भारत गंभीर Balance of Payments Crisis का सामना कर रहा था। विदेशी मुद्रा भंडार घटकर मात्र 1 अरब डॉलर रह गया था, जो केवल दो-तीन सप्ताह के आयात के लिए पर्याप्त था। देश सोने के भंडार गिरवी रखकर IMF और विश्व बैंक से कर्ज लेने को मजबूर हुआ था।

इसके मुख्य कारण थे-

  • 1980 के दशक में अनियंत्रित राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit) और भारी सब्सिडी।
  • 1990-91 का खाड़ी युद्ध, जिससे कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू गईं।
  • सोवियत संघ का विघटन- भारत का प्रमुख व्यापारिक साझेदार अचानक गायब हो गया।
  • राजनीतिक अस्थिरता- तीन साल में चार प्रधानमंत्री।

जुलाई 1991 में प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव और वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने ऐतिहासिक आर्थिक उदारीकरण (Liberalization) की नीति अपनाई। रुपए को 22% अवमूल्यन (Devaluation) किया गया, आयात शुल्क घटाए गए, औद्योगिक लाइसेंस राज (License Raj) समाप्त किया गया, विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) के द्वार खुले और सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका सीमित की गई।

इस संकट ने भारत को मजबूर किया कि वह 40 साल पुरानी समाजवादी अर्थव्यवस्था से बाजार-उन्मुख अर्थव्यवस्था की ओर मुड़े। परिणामस्वरूप 1990 के दशक के मध्य से भारत की GDP वृद्धि दर औसतन 6-7% पर पहुंच गई और देश वैश्विक अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण खिलाड़ी बना।